जब किसी बच्चे का जन्म होता है, तो उसे एक नाम दिया जाता है। धीरे-धीरे वही नाम उसकी पहचान बन जाता है। लोग उसे उसी नाम से पुकारते हैं, और समय के साथ वह स्वयं भी मान लेता है कि वही उसका वास्तविक स्वरूप है।

लेकिन एक प्रश्न है — क्या हम वास्तव में अपने नाम हैं?

यदि कल आपका नाम बदल दिया जाए, तो क्या आप बदल जाएँगे? यदि लोग आपको किसी और नाम से पुकारने लगें, तो क्या आपकी चेतना बदल जाएगी?

नाम समाज की सुविधा के लिए आवश्यक है। वह हमें पहचानने का एक माध्यम देता है। लेकिन नाम केवल एक संकेत है, स्वयं व्यक्ति नहीं।

इसी प्रकार जीवन में हमें अनेक पहचानें मिलती हैं। कोई स्वयं को लेखक मानता है, कोई शिक्षक, कोई व्यापारी, कोई साधक। लेकिन क्या ये पहचानें हमारी वास्तविकता हैं, या केवल भूमिकाएँ हैं जिन्हें हम कुछ समय के लिए निभाते हैं?

आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए, तो नाम, पद और भूमिकाएँ जीवन के वस्त्रों की तरह हैं। वे बदल सकते हैं, पर उन्हें धारण करने वाला कुछ और है।

शायद इसी कारण महान संत बार-बार भीतर लौटने की बात करते हैं। क्योंकि जब तक मनुष्य स्वयं को अपनी पहचानों तक सीमित रखता है, तब तक वह अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जान पाता।

प्रश्न यह नहीं है कि आपका नाम क्या है। प्रश्न यह है कि वह कौन है जो इस नाम को अपना कहता है।

और शायद उसी प्रश्न में आत्म-खोज की पूरी यात्रा छिपी हुई है।

— Kabir Shah
Author | Spiritual Thinker & Seeker
Exploring the Depths of the Soul and the Truth of Life
🌐 http://www.kabirshahauthor.com

Kabir Shah – Author | Spiritual Thinker & Seeker | Constantly in search of the depths of the soul and the truth of life.

कबीर शाह लेखक | आध्यात्मिक चिंतक | साधक

मैं शब्दों से नहीं,
मौन से लिखता हूँ—
ताकि मन नहीं,
चेतना जागे।

मेरी रचनाएँ
अंतरलोक,
आत्मा की स्मृति
और सत्य की खोज हैं।

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