मनुष्य का अधिकांश जीवन विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं में बीत जाता है। कभी हम प्रसन्न होते हैं, कभी दुखी। कभी क्रोध हमें घेर लेता है, तो कभी भय। लेकिन क्या हमने कभी यह देखने का प्रयास किया है कि इन सबको देखने वाला कौन है?

आध्यात्मिक परंपराएँ इसी देखने वाले को “साक्षी” कहती हैं। साक्षी वह है जो विचारों को देखता है, लेकिन स्वयं विचार नहीं है। वह भावनाओं को अनुभव करता है, लेकिन स्वयं भावना नहीं है।

जब मनुष्य साक्षी भाव में जीना शुरू करता है, तो जीवन बदलने लगता है। परिस्थितियाँ पहले जैसी ही रहती हैं, लेकिन उनके प्रति दृष्टिकोण बदल जाता है। व्यक्ति प्रतिक्रियाओं का गुलाम नहीं रहता, बल्कि जागरूक होकर निर्णय लेने लगता है।

साक्षी भाव का अर्थ जीवन से भागना नहीं है। इसका अर्थ है जीवन को पूरी जागरूकता के साथ जीना। जब हम स्वयं को देखने लगते हैं, तब धीरे-धीरे मन शांत होने लगता है और भीतर एक नई स्पष्टता जन्म लेती है।

शायद आत्मज्ञान की यात्रा का पहला कदम यही है — स्वयं को देखना।

— Kabir Shah
Author | Spiritual Thinker & Seeker

Kabir Shah – Author | Spiritual Thinker & Seeker | Constantly in search of the depths of the soul and the truth of life.

कबीर शाह लेखक | आध्यात्मिक चिंतक | साधक

मैं शब्दों से नहीं,
मौन से लिखता हूँ—
ताकि मन नहीं,
चेतना जागे।

मेरी रचनाएँ
अंतरलोक,
आत्मा की स्मृति
और सत्य की खोज हैं।

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